खेती- किसानी

by R.K. Maan | 11 Jul 2021 | Opinion

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खेती-किसानी, फौज-नौकरी और खेल-खिलाड़ी तो ठीक है पर इन के साथ-साथ व्यापार पर भी पकड़ बनानी होगी गांव के किसान कमेरे युवाओं को

छोटे सा दुकानदार कुछ सालों में लाखों-करोडों कमा लेता है..✍️

1947 में पाकिस्तान से आये दुजाना झज्जर में जमीन अलोट हुए रामरखा नारंग ने तब 70 ₹ में 8 किले बेच पानीपत जा मूंगफली शिकंजी की रेहड़ी लगाई थी आज वहां उनके परिवार के पास 700 करोड़ से ऊपर ज्ञात व इससे 10 गुणा ज्यादा अज्ञात सम्पत्ति है हैंडलूम व प्रॉपर्टी के बड़े कारोबारी हैं रुतबा है सरकारों में रौब है उनकी गुड़गांव, बैंगलुरु में बड़ी बियर बार भी है।

और वो परिवार जिसने उनकी जमीन खरीद खेती की थी ने दिनरात हाड़ तोड़ मेहनत कर मिट्टी के साथ मिट्टी हो 1988 तक 8 के 15 किले बनाये थे जो तब लगभग 12 लाख कीमत के ही थे। उसके बाद तो खेती घाटे का सौददा बनती गयी और आज तो उनके पास सिर्फ 5 किले जमीन ही बची है। परिवार के तीन चार युवा जबरदस्त नशेड़ी हैं कुछ युवा जबरदस्त मेहनत के बाद भी लाचार है, 3 लड़कों की शादी इसलिए नहीं हुई कि वो नोकरी में या अमीर नहीं हैं। 

ये तो एक उदहारण जो दोनों तरफ वालों को मैंने निजी तौर पर जाना है पुराने पंजाब पश्चिमी up दिल्ली देहात में

ऐसे कुछ लाख रामरखा नारंग के परिवार हैं और दूसरी तरफ करोड़ो खेतिहर परिवार

सोचना होगा चूक कहां हो रही है

अपनी जमीनें बचाते हुए व्यापार शाशन प्रशाशन में कैसे भागीदार बना जाए ...और फिर भागीदार बनना ही होगा

.... वरना तुम्हारी बर्बादी की ये दास्तानें लिखी जाती ही रहेंगी गांव कस्बों वालो और दूसरी तरफ नारंगों के शहर महानगर बन बढ़ते ही जायेंगे और तुम् उनकी उनकी तरफ कतार में मजदूर बनकर लगते ही जाओगे.....